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आख़िर बेटी क्यों नहीं ?

  एक दिन नीरू और SK जब मेट्रो से जा रहे थे तब सामने की सीट पर लिखा था "केवल महिलाओं के लिए "  SK अचानक बोल पड़ा .. अरे मेरी नज़र में लड़का लड़की बराबर हैं। यहां तो औरत ही औरत  की दुश्मन बनी हुई है । औरत ही नहीं चाहती कि उसे लड़की हो जाए । (S.K ने नीरू को देखकर कहा) सच कहूं S.K  मैं भी लड़की नहीं चाहती इसलिए नहीं कि मुझे बेटे की चाहत है । फिर क्या बात हो सकती है नीरू ?  बात, बात ये है कि मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटी भी उस राह से गुजरे जिनसे मैं चल कर आई हूं । मैं नहीं चाहती कि भीड़ चलते हुए किसी दिन उसे अपने लड़की होने पर दुःख हो या बस में बीच वाली सीट पर बैठ कर उसे अपने लड़की होने का डर लगे । उसके बालों की आज़ादी पर सवाल ना उठाए जाएं, मैं नहीं चाहती कि बाल छोटे रखने पर लोग उससे सवाल करें "इतने छोटे बाल, लड़का हो क्या "?  मैं नहीं चाहती ट्रेन में बैठे हुए लोग ऊपर की बर्थ पर चढ़ते हुए टक टकी लगा कर देखें ।  मैं नहीं चाहती उसे भी हॉस्टल में एंट्री टाइम से एक सेकेंड ऊपर हो जाने पर सवाल पूछे जाए कहां घूम रहे थे, एंट्री टाइम का ध्यान कौन रखेगा । मैं नहीं चाहत...

पक्का रंग

  आज कोर्ट की तारीख़ है मैं जल्दी निकल जाऊंगा। मां .. तुम राधा को कहना कि जल्दी व्हाइट शर्ट प्रेस कर दे। जय राधा की ओर मुड़ा और बोला की देख क्या रही हो ? जल्दी करो । राधा डरते हुए बोली  भैया आज आपका व्हाइट शर्ट हम प्रेस नहीं कर पाएंगे । जय ने गुस्से में कहा आज थोड़ा देर से चली जाना, पहले से तैयारी की होती तो अभी देर नहीं होती । राधा ने डरते हुए कहा  "हम तो पहले से तैयारी कर रहे थे। इसलिए आपका और मैडम जी के कपड़े धो रहे थे । तो फिर प्रेस नहीं हुआ अब तक ? भैया, मैडम जी की साड़ी, सिंदूरी रंग की.. जो अपने करवाचौथ पर गिफ्ट की थी! जय थोड़ी देर के लिए नैना की याद में खो गया । सोचते सोचते नैना की कही एक पुरानी बात याद आ गई, तुमसे बात करती हूं तो वक्त का पता ही नहीं चलता कहां गुजर जाता, देखो मेरी चाय भी एक कप से आधा कप हो गई है । जय का  दिल भर गया  कि कैसे कोई एक साल की शादी में दो महीने भी खुश ना रहा हो । कैसे उसने कॉलेज से लेकर शादी तक नैना की हर ख्वाहिश पूरी की थी । वही नैना आज मुझे तलाक़ के लिए कोर्ट ले जा रही है । लगता है चाय की तरह हमारा रिश्ता कभी गाढ़ा नहीं ...

हीरो है वो

  मेरी हाथ घड़ी में सुबह के 7 बजे थे,रविवार का दिन था मुझे आज अकेले ही शिशु मंदिर जाना था, सोनिया मैम और दीप्ति मैम नहीं थे आज मुझे पुकारने के लिए "प्रेमू! चल, देर हो रही है"। मैं चलते चलते शिशु मंदिर की एक कक्षा में आ पहुंची। कमरा ख़ाली था लेकिन सामने की दीवार पर ब्लैकबोर्ड था ठीक मेरे स्कूल की दीवार जैसा । मैं अपनी कक्षा में तीसरी पंक्ति में बैठती थी और मेरे पीछे बैठती थी एक लड़की "रूबीना"। मुझे याद है वो दिन जब हम अजनबी से दोस्त बने थे, उसने मुझसे गणित का एक सवाल पूछा था..जिसका हल करते हुए छुट्टी की घंटी बज गई थी और हम दोनो ने रास्ते भर बातें की थी, मैं कम बोलती हूं और रूबीना  कभी चुप ही नहीं होती थी।  "मेरी दादी मुझे लतीफा कहती हैं..अरे अब तो हँस दे..कितना सीरियस रहती है यार तू ।" उसकी ये बात मुझे याद रह गई थी । उसने अपनी खिलखाती हुई हंसी के पीछे कैसे इतनी समस्याओं को छुपा लिया था, ये मैं आज तक समझ नहीं पाई । बच्चों की आवाज़ आई तो मैं अपने ख्यालों से निकलकर बच्चों से बातें करने लगी । दीदी आज कौन सी ऐक्टिविटी करेंगे? आप ड्रावनिंग कब करवाओगे ? बहुत सारे ...

काम है या शौक़ ?

  कल देर रात तक हुई बारिश के बाद आज एक साफ आसमान दिखाई दिया । मैं शाम को छत पर बैठी थी, रोज़ की तरह ( 9 to 5 का जॉब करने के बाद) पंछी घर को लौट रहे थे । आज उनको देखकर ईर्ष्या नहीं हुई, क्योंकि अब मैं भी घर को लौट जाऊंगी ।  रोज़ की तरह मैं जंग लगी हुईं मेज़ पर बैठी थी। फ़ोन की स्क्रीन से नज़र हटी तो, कटी हुई पतंग का मांझा सुलझता हुआ दिखाई दिया। पीछे अंकल और आंटी खड़े थे । आंटी कई दिन बाद लौटी थीं अपने घर से, सो मैं उनसे काफ़ी दिन बाद मिल रही थी। उन्होंने पूछा "कैसे हो बेटा"? मैंने कहा "अच्छी हूं आंटी"। कितने दिन बाद मैंने अंकल आंटी को बिना मास्क लगाए देखा । चेहरे की मुसुकुराहट ना दिखे ना, तो बात अधूरी सी लगती है । सच बताऊं तो मुझे मास्क लगाकर बात करने में पूरी बात समझ ही नहीं आती, असहज महसूस करती हूं । इस का कारण शायद यह हो सकता है कि मैं चेहरे का भाव नहीं पढ़ पाती हूं । बातों ही बातों में अंकल ने कहा कि आपका ब्लॉग पढ़ा था बेटा, अच्छा लगा पढ़कर लेकिन मुझे एक बात खल रही है । मुझे पूछा "जी अंकल ? "बेटा, आपने अपने पीएचडी, अपने विषय से सम्बन्धित कुछ नहीं लिखा...

हमारा साजी

"कौन सी ने मारा री मेरा मचला श्याम सलोना लाला दूध ना पीवे लाला मक्खन ना खाये सुबक सुबक के रोए री मेरा मचला श्याम सलोना "    ये गीत मैंने नाना जी से सुना था वो इसे बहुत ही मधुर तानों के साथ सुनाया करते थे । गांव में उन्हें सब नेताजी के नाम से और मैं नाना जी से जानती थी । घुंघराले बाल, चौड़ा माथे के साथ ऊंची कद काठी के नाना जी, सफ़ेद रंग की कमीज़ और धोती के साथ नोक दार जूते पहनते थे । गर्मी की हर छुट्टी में मैंने उन नुकीले जूतों को पहनने की भरसक लेकिन नाकाम कोशिश की है । जब जूते पहनकर मैं गिर जाती थी तो नानाजी कहते थे "हमारा साजी तो गिर गया, अब कौन चलेगा हमारे साथ" ? और मैं तुरंत ही उठकर चलने लगती थी । मैं बड़ी होती चली गई और नानाजी बूढ़े होते चले गए, और हमारी किस्से कहानियां कम होती चली गईं । उनका सवाल था कि घर से इतनी दूर पढ़ाई करने गए हो, कभी मिलने आ सकोगे हमसे ? मैंने कहा "आती रहूंगी साजी" और तेरा भाई, वो कहां जायेगा अब ? वो तो मुम्बई ही जायेगा । बम्बई ? नानाजी ने आश्चर्य से देखा  और फिर बोले, बम्बई तो बहुत दूर है "हम तो ना पहुंच पाएंगे।...

तीन गुना खर्चा

  "मुझे सरपंच जी से मिलना है क्या आप मुझे उनका पता  बता सकते हैं ?"  उदयपुर से वल्लभ नगर पहुंचाने वाली बस से उतरकर, ना जाने कितने लोगो से मैं यह प्रश्न पूछ चुकी थी, कुछ देर की मशकत के बाद स्वास्थ्य केंद्र के एक कर्मी ने मुझ से कहा   "चलिए, मैं आपकी सहायता करता हूं "।  चिलचिलाती धूप में, स्कार्फ से ढके मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई । उन्होंने मुझे सरपंच जी के घर तक छोड़ दिया । मैंने सरपंच जी से निवेदन किया मुझे कुछ प्रश्न पूछने हैं किसान भाइयों से, कुछ समय मिल जाता तो.. सरपंच जी ने बैठे बैठे ही मौन सहमति दे दी और बैठने के लिए आग्रह किया । मैं प्लास्टिक की कुर्सी पर चुपचाप बैठ गई । सरपंच जी ने अधूरी बात पूरी की .. रे, सचिव जी कैसी बात कर रहे  हैं ? खर्चा दुगुना क्यों कर रहे हैं, अब आप ही सोचा ना, अगर कोई महिला सरपंच बनेगी तो जहां भी जायेगी उसे ड्राइवर की आवश्यकता पड़ेगी, और दावत में अकेले तो जायेगी नहीं, सो पतिदेव को भी साथ जाना पड़ेगा । अब आपको तीन लोगो को खाना खिलाना पड़ेगा, या नहीं? बोलिये ? सचिव जी खड़े हुए ही बोले सही कह रहे हैं सरपंच जी...लेकिन...

सांवली हूं मैं

  पिछले दिनों, कई लोगो ने मुझे टेक्स्ट किया कहा कि "सुंदर लग रही हो आजकल" मैंने एक फिकी मुसकुराहट वाला इमोजी "thank you" के साथ व्हाट्सएप पर भेज दिया । लोगों के एक कमेंट ने कहा कि " looking slim", थोड़ी देर में ही ऐसे बहुत से कॉमेंट्स की झड़ी लग गई । कॉलेज के पुराने दोस्तों ने कहा कि "तू तो यार एकदम ही बदल गई है अब तो कितनी सुंदर लग रही है ।" इस बात से मुझे खुशी तो नहीं हुई, लेकिन आश्चर्य अवश्य हुआ, कैसे तेल से गुथी हुई चोटी वाली, एक सावली लड़की घुटनो से लंबी सलवार कमीज़ पहने हुए, कब स्पा किए हुए बालों के साथ, माथे पर छोटी बिंदी, कानों में लंबे झुमके और हल्के रंग का टुप्पटा ओढ़ने लगी है, अब लोग उसे सुंदर कहते हैं ।      मैं आपको बताना चाहूंगी कि सुंदर कहलाने के पीछे, यहां  केवल श्रृंगार शब्द का प्रयोग नहीं किया गया । उसके पीछे लगा एक सीढ़ीनुमा अनुभव, जो आता है भय से लड़ने के बाद, बदसूरत कहे जाने का भय, आत्मविश्वास चूर चूर हो जाने का भय। मुझे भी भय लगा था जब सातवी कक्षा की लड़की ने स्कूल टीचर को कहते हुए सुना था " तुम एडोप्टेड हो क्या " ...

अजी सुनिए !

 अंकल..मुझे आज ही यहां शिफ्ट करना है, मैं ज्यादा इंतज़ार नहीं कर सकती, मैंने दरवाज़े पर खड़े हुए, विनमतापूर्वक कहा । अंकल आंटी ने मुझे हैरानी से देखा, फिर आंटी ने चिंता जताते हुए कहा, "बेटा आप कैसे रहोगे आज, रूम में फर्नीचर भी नहीं है, सफ़ाई भी नहीं हुई है यहां, मुझे काफ़ी बुरा लग रहा है ।  मैंने  मुस्कुराते हुए आंटी से कहा "आप टेंशन मत लीजिए आंटी, मैं सफाई कर लूंगी, मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं होगी।          रात में करीब दस बजे अंकल आंटी आए । आंटी ने पूछा "बेटा ! पीले पर्दे मिले हैं आप को कोई दिक्कत तो नहीं है ?" इस बार भी मेरा जवाब हां ही था। आंटी थोड़ी सी शख्त मिज़ाज  हैं लेकिन अंकल खुश मिज़ाज हैं । पर्दे टांगने कहां हैं, कितनी दूरी पर ड्रिल करना है सब आंटी उन्हें बता बता रही थीं "अजी, जरा ध्यान से करिएगा, कितना वक्त लगा रहे हैं, जल्दी कर दीजिए । इतने में आंटी का फोन बजा, वो कॉल अटेंड करने के लिए कमरे से बाहर चली गईं । अंकल ने सीढ़ी पर खड़े रहते हुए मुड़कर पीछे देखा, ठीक है जी ? आंटी को कमरे में ना पाकर, अंकल बाहर निकल कर बोले "अजी सुनिए, एक बा...

फिर शाम को ढलते देखा

रूठी हुई थी एक अरसे से आज मना ली मैंने भीग गई थी वो उस रोज बारिश में सो आज शाम सूखा ली मैंने पहले बोली मिले नहीं तुम बहुत दिनों से क्या तुम भी रूठ गए थे मैं ख़ामोश, सोचता रहा  तुम्हें क्या पता, कमरे के दरवाज़े से हर रोज़ मैं तो तुम्हें ही झांकता रहा परिंदे  घर को लौट रहे थे चांद भी दिखा  कई रोज़ लेकिन तुम्हारे बिन दिन से सीधे रात हो गई । कुछ आप बीती मैंने, कुछ उसने सुनाई, फिर छज्जे पर बैठे हम दोनों  शाम मुस्कुराई ख़ामोशी से परिंदो को देखा उस रोज़ मैंने फिर शाम को ढलते देखा

कुछ ज़रूरी चीज़ें

          कुछ ज़रूरी चीज़ें  PhD डिग्री की सभी  formalities  को पूरा करते करते थक रही  थी लेकिन महामारी के चलते , लॉकडाउन हो गया । हर जगह से खबर आ रही है कि मरीजों को अस्पतालों में कुछ ज़रूरी चीज़ें नहीं मिल पा रही हैं ।  कॉलेज बंद होने की वजह से मुझे प्रो उपाध्याय के घर जाना पड़ा। घर के दरवाज़े पर रगों से सजे गणेश जी और बारात का आधा अधूरा सा चित्र बना हुआ था । कारीगर ब्रश से बराबर रंग भरने में लगा हुआ था । मैं डॉरवेल की तरफ बढ़  ही  रही थी लेकिन प्रो उपाध्याय ने मुझे पुकारा " प्रेमलता .. जस्ट वेट .. I am coming" मैंने फीकी मुस्कुरहाट से हां में सर हिलाया । अप्रैल की धूप में मास्क लगाए हुए मुझे देखा और पूछा घर तक आने में कोई प्रोब्लम तो नहीं हुई ? मैंने  " ना"   में जवाब दिया । इससे पहले मैं कुछ और कहती प्रो उपाध्याय कहने लगी "बेटी की शादी है घर पर .. और कुछ ज़रूरी चीज...

कितना मुश्किल है पहाड़ होना

  पहाड़ों  का रास्ता और मैं समानांतर रूप से आगे बढ़ रहे हैं । यह रास्ता कई मोड़ लेता है और अपनी दिशा बदल लेता है इस रास्ते को देखकर लगता है यह तो मेरी आत्मकथा है । पहाड़ में जन्मे हर व्यक्ति की कहानी कहता है पहाड़ तुमने पहाड़ों को बोलते हुए तो सुना ही होगा क्या तुमने कभी पहाड़ो को मरते हुए देखा है? नहीं, पहाड़ कभी नहीं मरते, ना ही कभी बूढ़े होते हैं कहानियां भी कभी नहीं मरती वो भी अमर हो जाती हैं पहाड़ों के बीच मेरे और तुम्हारे बीच क्या तुमने कभी सोचा मरने के बाद आखि़र कहां जाती होगी रूह हां.. कई बार सोचा और जबाब मिला इस जमीं और आसमां के दरमियान जो पहाड़ हैं बस, वही बस जाती है पहाड़ों को छोड़ कोई कभी जा सकता है क्या ? पहाड़ होना हल्की धुंध में लिपटे हुए पहाड़ सफ़ेद बर्फ से ढके हुए पहाड़ गिरती हुई बारिश में भीगते पहाड़ हल्की धूप में सोने से चमकते पहाड़ हमेशा ही ख़ूबसूरत होते हैं पहाड़ काश! पहाड़ भी बोल पाते कितना मुश्किल होता है पहाड़ बने रहना । पहाड़ और नदी तुम तो पर्वत हो स्थिर, विशाल शिखर से ऊंचे और तुम? तुम्हारे विपरीत, गहराई की ओर भावनाओं से भरी हुई, निरन्तर बहने वाली, नदी...

कविता क्या है ?

आसान सवालो के जवाब अक्सर मुश्किल होते हैं कविता क्या है कहाँ है क्यों है? ये सब है पूछते पर ये पूछता नही कोई कविता कहाँ नहीं है ? कविता क्या नहीं है? कविता मेरे अंदर भी है कविता मेरे बाहर भी है? पर सवाल यही है ? जगबीती लिखुं या आपबीती लिखुं एक बात तुम्हारी भी सही है एक बात मेरी भी सही है । कविता की कोई परिभाषा ही नही है । जो कागज़ पर सहेजा है मैंने वो कविता है जो मन पर उकेरा है मैन वो कविता है कविता मैं क्या लिखूं ये कविता मुझको दिन रात लिखती है । ये पल बीते साल लिखूं या सदियों बीती बात लिखूं । सरसों से भरा खेत लिखूं या हथेली से फिसलती रेत लिखूं आँखों से बहता प्यार लिखूं या समंदर के उस पार लिखू कविता मैं क्या लिखूं ये कविता मुझको दिन रात लिखती है । तेरी मेरी बात लिखूं या जीवन भर का साथ लिखूं फूलों सी महकती मुस्कान लिखूं या ये धरती आसमान लिखूं कविता मैं क्या लिखूं  ये कविता मुझको दिन रात लिखती है । जीवन का सार लिखू या प्रतिदिन का व्यवहार लिखूं । कोई बिछड़ा मीत लिखूं या कण में बसा संगीत लिखूं पर सवाल यही है ? जगबीती लिखुं या आपबीती लिखुं एक बात तुम्हारी भी सही है एक बात मेरी भी सही है ...

नमक और चीनी

  शाम की चाय पीते हुए मन में एक ख़्याल आया की ज़िंदगी को खट्टा मीठा बनाने के लिए चीनी और नमक, दोनो ही कितने जरूरी हैं । चाय की हर एक चुस्की मुझे यह यकीन दिलाती थी हां मीठी तो है ज़िंदगी.. उम्र के साथ थोड़ा थोड़ा अनुभव  घुलना पड़ता है । अच्छी चाय बनाने के लिए  चाय की पत्ती और दूध को पकाना जरूरी होता है ना ? और कभी अदरक के साथ पका लिया तो रंग के साथ के साथ खुशबू भी अच्छी तरह चढ़ जाती है । चाय के साथ एक मुरमुरे वाली  नमकीन भी थी जो मैंने खुद बनाई थी । नमकीन के साथ होने के दो मुख्य कारण थे।  पहला तो यह, कि  मुझे ज्यादा मीठा पसंद नहीं, दूसरा कारण शायद यह था कि जिंदगी में किसी का साथ मिल जाए ना तो जिंदगी आसान हो जाती है ।  एक नमक और एक चीनी, याद है बचपन में जब मम्मी खाने में ज्यादा नमक और मसाले पसंद करती थी।  खाने के बाद पापा एक रसगुल्ला खिला कर सबकुछ ठीक कर देते थे। "ले अब मिर्च नहीं लगेगी" । समय बीत गया है मम्मी ने मसाले कम कर दिए हैं लेकिन जब भी जिंदगी में नमक कम लगता है तो चुटकी भर नमक मिलाकर सब ठीक कर देती हैं । रसगुल्ला अब मम्मी नहीं खा पाती, डायब...