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काम है या शौक़ ?

  कल देर रात तक हुई बारिश के बाद आज एक साफ आसमान दिखाई दिया । मैं शाम को छत पर बैठी थी, रोज़ की तरह ( 9 to 5 का जॉब करने के बाद) पंछी घर को लौट रहे थे । आज उनको देखकर ईर्ष्या नहीं हुई, क्योंकि अब मैं भी घर को लौट जाऊंगी ।  रोज़ की तरह मैं जंग लगी हुईं मेज़ पर बैठी थी। फ़ोन की स्क्रीन से नज़र हटी तो, कटी हुई पतंग का मांझा सुलझता हुआ दिखाई दिया। पीछे अंकल और आंटी खड़े थे । आंटी कई दिन बाद लौटी थीं अपने घर से, सो मैं उनसे काफ़ी दिन बाद मिल रही थी। उन्होंने पूछा "कैसे हो बेटा"? मैंने कहा "अच्छी हूं आंटी"। कितने दिन बाद मैंने अंकल आंटी को बिना मास्क लगाए देखा । चेहरे की मुसुकुराहट ना दिखे ना, तो बात अधूरी सी लगती है । सच बताऊं तो मुझे मास्क लगाकर बात करने में पूरी बात समझ ही नहीं आती, असहज महसूस करती हूं । इस का कारण शायद यह हो सकता है कि मैं चेहरे का भाव नहीं पढ़ पाती हूं । बातों ही बातों में अंकल ने कहा कि आपका ब्लॉग पढ़ा था बेटा, अच्छा लगा पढ़कर लेकिन मुझे एक बात खल रही है । मुझे पूछा "जी अंकल ? "बेटा, आपने अपने पीएचडी, अपने विषय से सम्बन्धित कुछ नहीं लिखा...

सांवली हूं मैं

  पिछले दिनों, कई लोगो ने मुझे टेक्स्ट किया कहा कि "सुंदर लग रही हो आजकल" मैंने एक फिकी मुसकुराहट वाला इमोजी "thank you" के साथ व्हाट्सएप पर भेज दिया । लोगों के एक कमेंट ने कहा कि " looking slim", थोड़ी देर में ही ऐसे बहुत से कॉमेंट्स की झड़ी लग गई । कॉलेज के पुराने दोस्तों ने कहा कि "तू तो यार एकदम ही बदल गई है अब तो कितनी सुंदर लग रही है ।" इस बात से मुझे खुशी तो नहीं हुई, लेकिन आश्चर्य अवश्य हुआ, कैसे तेल से गुथी हुई चोटी वाली, एक सावली लड़की घुटनो से लंबी सलवार कमीज़ पहने हुए, कब स्पा किए हुए बालों के साथ, माथे पर छोटी बिंदी, कानों में लंबे झुमके और हल्के रंग का टुप्पटा ओढ़ने लगी है, अब लोग उसे सुंदर कहते हैं ।      मैं आपको बताना चाहूंगी कि सुंदर कहलाने के पीछे, यहां  केवल श्रृंगार शब्द का प्रयोग नहीं किया गया । उसके पीछे लगा एक सीढ़ीनुमा अनुभव, जो आता है भय से लड़ने के बाद, बदसूरत कहे जाने का भय, आत्मविश्वास चूर चूर हो जाने का भय। मुझे भी भय लगा था जब सातवी कक्षा की लड़की ने स्कूल टीचर को कहते हुए सुना था " तुम एडोप्टेड हो क्या " ...

कुछ ज़रूरी चीज़ें

          कुछ ज़रूरी चीज़ें  PhD डिग्री की सभी  formalities  को पूरा करते करते थक रही  थी लेकिन महामारी के चलते , लॉकडाउन हो गया । हर जगह से खबर आ रही है कि मरीजों को अस्पतालों में कुछ ज़रूरी चीज़ें नहीं मिल पा रही हैं ।  कॉलेज बंद होने की वजह से मुझे प्रो उपाध्याय के घर जाना पड़ा। घर के दरवाज़े पर रगों से सजे गणेश जी और बारात का आधा अधूरा सा चित्र बना हुआ था । कारीगर ब्रश से बराबर रंग भरने में लगा हुआ था । मैं डॉरवेल की तरफ बढ़  ही  रही थी लेकिन प्रो उपाध्याय ने मुझे पुकारा " प्रेमलता .. जस्ट वेट .. I am coming" मैंने फीकी मुस्कुरहाट से हां में सर हिलाया । अप्रैल की धूप में मास्क लगाए हुए मुझे देखा और पूछा घर तक आने में कोई प्रोब्लम तो नहीं हुई ? मैंने  " ना"   में जवाब दिया । इससे पहले मैं कुछ और कहती प्रो उपाध्याय कहने लगी "बेटी की शादी है घर पर .. और कुछ ज़रूरी चीज...