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A blog about poetry and short stories based on real life experiences.

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आख़िर बेटी क्यों नहीं ?

  एक दिन नीरू और SK जब मेट्रो से जा रहे थे तब सामने की सीट पर लिखा था "केवल महिलाओं के लिए "  SK अचानक बोल पड़ा .. अरे मेरी नज़र में लड़का लड़की बराबर हैं। यहां तो औरत ही औरत  की दुश्मन बनी हुई है । औरत ही नहीं चाहती कि उसे लड़की हो जाए । (S.K ने नीरू को देखकर कहा) सच कहूं S.K  मैं भी लड़की नहीं चाहती इसलिए नहीं कि मुझे बेटे की चाहत है । फिर क्या बात हो सकती है नीरू ?  बात, बात ये है कि मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटी भी उस राह से गुजरे जिनसे मैं चल कर आई हूं । मैं नहीं चाहती कि भीड़ चलते हुए किसी दिन उसे अपने लड़की होने पर दुःख हो या बस में बीच वाली सीट पर बैठ कर उसे अपने लड़की होने का डर लगे । उसके बालों की आज़ादी पर सवाल ना उठाए जाएं, मैं नहीं चाहती कि बाल छोटे रखने पर लोग उससे सवाल करें "इतने छोटे बाल, लड़का हो क्या "?  मैं नहीं चाहती ट्रेन में बैठे हुए लोग ऊपर की बर्थ पर चढ़ते हुए टक टकी लगा कर देखें ।  मैं नहीं चाहती उसे भी हॉस्टल में एंट्री टाइम से एक सेकेंड ऊपर हो जाने पर सवाल पूछे जाए कहां घूम रहे थे, एंट्री टाइम का ध्यान कौन रखेगा । मैं नहीं चाहत...