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हीरो है वो

  मेरी हाथ घड़ी में सुबह के 7 बजे थे,रविवार का दिन था मुझे आज अकेले ही शिशु मंदिर जाना था, सोनिया मैम और दीप्ति मैम नहीं थे आज मुझे पुकारने के लिए "प्रेमू! चल, देर हो रही है"। मैं चलते चलते शिशु मंदिर की एक कक्षा में आ पहुंची। कमरा ख़ाली था लेकिन सामने की दीवार पर ब्लैकबोर्ड था ठीक मेरे स्कूल की दीवार जैसा । मैं अपनी कक्षा में तीसरी पंक्ति में बैठती थी और मेरे पीछे बैठती थी एक लड़की "रूबीना"। मुझे याद है वो दिन जब हम अजनबी से दोस्त बने थे, उसने मुझसे गणित का एक सवाल पूछा था..जिसका हल करते हुए छुट्टी की घंटी बज गई थी और हम दोनो ने रास्ते भर बातें की थी, मैं कम बोलती हूं और रूबीना  कभी चुप ही नहीं होती थी।  "मेरी दादी मुझे लतीफा कहती हैं..अरे अब तो हँस दे..कितना सीरियस रहती है यार तू ।" उसकी ये बात मुझे याद रह गई थी । उसने अपनी खिलखाती हुई हंसी के पीछे कैसे इतनी समस्याओं को छुपा लिया था, ये मैं आज तक समझ नहीं पाई । बच्चों की आवाज़ आई तो मैं अपने ख्यालों से निकलकर बच्चों से बातें करने लगी । दीदी आज कौन सी ऐक्टिविटी करेंगे? आप ड्रावनिंग कब करवाओगे ? बहुत सारे ...

काम है या शौक़ ?

  कल देर रात तक हुई बारिश के बाद आज एक साफ आसमान दिखाई दिया । मैं शाम को छत पर बैठी थी, रोज़ की तरह ( 9 to 5 का जॉब करने के बाद) पंछी घर को लौट रहे थे । आज उनको देखकर ईर्ष्या नहीं हुई, क्योंकि अब मैं भी घर को लौट जाऊंगी ।  रोज़ की तरह मैं जंग लगी हुईं मेज़ पर बैठी थी। फ़ोन की स्क्रीन से नज़र हटी तो, कटी हुई पतंग का मांझा सुलझता हुआ दिखाई दिया। पीछे अंकल और आंटी खड़े थे । आंटी कई दिन बाद लौटी थीं अपने घर से, सो मैं उनसे काफ़ी दिन बाद मिल रही थी। उन्होंने पूछा "कैसे हो बेटा"? मैंने कहा "अच्छी हूं आंटी"। कितने दिन बाद मैंने अंकल आंटी को बिना मास्क लगाए देखा । चेहरे की मुसुकुराहट ना दिखे ना, तो बात अधूरी सी लगती है । सच बताऊं तो मुझे मास्क लगाकर बात करने में पूरी बात समझ ही नहीं आती, असहज महसूस करती हूं । इस का कारण शायद यह हो सकता है कि मैं चेहरे का भाव नहीं पढ़ पाती हूं । बातों ही बातों में अंकल ने कहा कि आपका ब्लॉग पढ़ा था बेटा, अच्छा लगा पढ़कर लेकिन मुझे एक बात खल रही है । मुझे पूछा "जी अंकल ? "बेटा, आपने अपने पीएचडी, अपने विषय से सम्बन्धित कुछ नहीं लिखा...