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हमारा साजी

"कौन सी ने मारा री मेरा मचला श्याम सलोना
लाला दूध ना पीवे लाला मक्खन ना खाये
सुबक सुबक के रोए री मेरा मचला श्याम सलोना "
   ये गीत मैंने नाना जी से सुना था वो इसे बहुत ही मधुर तानों के साथ सुनाया करते थे । गांव में उन्हें सब नेताजी के नाम से और मैं नाना जी से जानती थी ।
घुंघराले बाल, चौड़ा माथे के साथ ऊंची कद काठी के नाना जी, सफ़ेद रंग की कमीज़ और धोती के साथ नोक दार जूते पहनते थे । गर्मी की हर छुट्टी में मैंने उन नुकीले जूतों को पहनने की भरसक लेकिन नाकाम कोशिश की है । जब जूते पहनकर मैं गिर जाती थी तो नानाजी कहते थे "हमारा साजी तो गिर गया, अब कौन चलेगा हमारे साथ" ? और मैं तुरंत ही उठकर चलने लगती थी ।
मैं बड़ी होती चली गई और नानाजी बूढ़े होते चले गए,
और हमारी किस्से कहानियां कम होती चली गईं ।
उनका सवाल था कि घर से इतनी दूर पढ़ाई करने गए हो, कभी मिलने आ सकोगे हमसे ?
मैंने कहा "आती रहूंगी साजी"
और तेरा भाई, वो कहां जायेगा अब ?
वो तो मुम्बई ही जायेगा ।
बम्बई ? नानाजी ने आश्चर्य से देखा  और फिर बोले, बम्बई तो बहुत दूर है "हम तो ना पहुंच पाएंगे।" पंतनगर का तो हमें पता है ।
दूसरी बार जब मैं पंतनगर से नानाजी के घर गई तब
नानाजी आंगन में बैठे थे, चारपाई के नीचे नुकीले जूते रखे थे, माचिस का डिब्बा चारपाई पर रखा था, आज डिब्बा बज नहीं रहा था । तबीयत खराब रहने लगी थी, सफ़ेद कमीज़ दिन प्रतिदिन मैली होती जा रही थी । शरीर की ऊर्जा कम हो गई थी और मस्तिष्क की झुलझुलाहट बढ़ती जा थी । "मुझे मीठी गुजिया नहीं दे सकते तो, फीकी भी मत दो, मैं बीमार नहीं हूं" और फिर तेज़ खांसते हुए चारपाई पर लेट गए ।  बुढ़ापे में अपनो को ना देख पाने की टीस और बीमारी का एहसास बहुत बुरा होता है ।
कुछ दिन बाद, पापा का फ़ोन आया था, मैं अपनी छोटी बहन को गोद में लिए खिड़की के सामने बैठी थी।  मेरे भाई ने फ़ोन उठाया, फ़ोन स्पीकर पर था "बेटा, नानाजी चले गए आज" सन्नाटे में आवाज़ गूंज गई थी "हमारा साजी तो गिर गया, अब कौन चलेगा हमारे साथ ?




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