रूठी हुई थी एक अरसे से आज मना ली मैंने भीग गई थी वो उस रोज बारिश में सो आज शाम सूखा ली मैंने पहले बोली मिले नहीं तुम बहुत दिनों से क्या तुम भी रूठ गए थे मैं ख़ामोश, सोचता रहा तुम्हें क्या पता, कमरे के दरवाज़े से हर रोज़ मैं तो तुम्हें ही झांकता रहा परिंदे घर को लौट रहे थे चांद भी दिखा कई रोज़ लेकिन तुम्हारे बिन दिन से सीधे रात हो गई । कुछ आप बीती मैंने, कुछ उसने सुनाई, फिर छज्जे पर बैठे हम दोनों शाम मुस्कुराई ख़ामोशी से परिंदो को देखा उस रोज़ मैंने फिर शाम को ढलते देखा
कुछ उधड़े हुए ख़वाब बुन रही हूं...