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नमक और चीनी

 



शाम की चाय पीते हुए मन में एक ख़्याल आया की ज़िंदगी को खट्टा मीठा बनाने के लिए चीनी और नमक, दोनो ही कितने जरूरी हैं । चाय की हर एक चुस्की मुझे यह यकीन दिलाती थी हां मीठी तो है ज़िंदगी.. उम्र के साथ थोड़ा थोड़ा अनुभव  घुलना पड़ता है । अच्छी चाय बनाने के लिए  चाय की पत्ती और दूध को पकाना जरूरी होता है ना ? और कभी अदरक के साथ पका लिया तो रंग के साथ के साथ खुशबू भी अच्छी तरह चढ़ जाती है । चाय के साथ एक मुरमुरे वाली  नमकीन भी थी जो मैंने खुद बनाई थी । नमकीन के साथ होने के दो मुख्य कारण थे।  पहला तो यह, कि  मुझे ज्यादा मीठा पसंद नहीं, दूसरा कारण शायद यह था कि जिंदगी में किसी का साथ मिल जाए ना तो जिंदगी आसान हो जाती है ।  एक नमक और एक चीनी, याद है बचपन में जब मम्मी खाने में ज्यादा नमक और मसाले पसंद करती थी।  खाने के बाद पापा एक रसगुल्ला खिला कर सबकुछ ठीक कर देते थे। "ले अब मिर्च नहीं लगेगी" । समय बीत गया है मम्मी ने मसाले कम कर दिए हैं लेकिन जब भी जिंदगी में नमक कम लगता है तो चुटकी भर नमक मिलाकर सब ठीक कर देती हैं । रसगुल्ला अब मम्मी नहीं खा पाती, डायबिटीज है ना, लेकिन पापा ने चीनी की कमी कभी महसूस नहीं होने दी । शाम की चाय में मम्मी के हिस्से की चीनी वो अपने कप में मिला लेते हैं । यही तो नमक और चीनी का साथ, ऐसा  सोचते सोचते मैंने नमकीन से भरी प्लेट खाली कर दी थी । देखा तो पाया कि अंत में मेरे कप में थोड़ी चीनी और प्लेट में नमक ही नमक रह गया था ।

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