कल देर रात तक हुई बारिश के बाद आज एक साफ आसमान दिखाई दिया । मैं शाम को छत पर बैठी थी, रोज़ की तरह ( 9 to 5 का जॉब करने के बाद) पंछी घर को लौट रहे थे । आज उनको देखकर ईर्ष्या नहीं हुई, क्योंकि अब मैं भी घर को लौट जाऊंगी । रोज़ की तरह मैं जंग लगी हुईं मेज़ पर बैठी थी। फ़ोन की स्क्रीन से नज़र हटी तो, कटी हुई पतंग का मांझा सुलझता हुआ दिखाई दिया। पीछे अंकल और आंटी खड़े थे । आंटी कई दिन बाद लौटी थीं अपने घर से, सो मैं उनसे काफ़ी दिन बाद मिल रही थी। उन्होंने पूछा "कैसे हो बेटा"? मैंने कहा "अच्छी हूं आंटी"। कितने दिन बाद मैंने अंकल आंटी को बिना मास्क लगाए देखा । चेहरे की मुसुकुराहट ना दिखे ना, तो बात अधूरी सी लगती है । सच बताऊं तो मुझे मास्क लगाकर बात करने में पूरी बात समझ ही नहीं आती, असहज महसूस करती हूं । इस का कारण शायद यह हो सकता है कि मैं चेहरे का भाव नहीं पढ़ पाती हूं । बातों ही बातों में अंकल ने कहा कि आपका ब्लॉग पढ़ा था बेटा, अच्छा लगा पढ़कर लेकिन मुझे एक बात खल रही है । मुझे पूछा "जी अंकल ? "बेटा, आपने अपने पीएचडी, अपने विषय से सम्बन्धित कुछ नहीं लिखा...
कुछ उधड़े हुए ख़वाब बुन रही हूं...