"कौन सी ने मारा री मेरा मचला श्याम सलोना लाला दूध ना पीवे लाला मक्खन ना खाये सुबक सुबक के रोए री मेरा मचला श्याम सलोना " ये गीत मैंने नाना जी से सुना था वो इसे बहुत ही मधुर तानों के साथ सुनाया करते थे । गांव में उन्हें सब नेताजी के नाम से और मैं नाना जी से जानती थी । घुंघराले बाल, चौड़ा माथे के साथ ऊंची कद काठी के नाना जी, सफ़ेद रंग की कमीज़ और धोती के साथ नोक दार जूते पहनते थे । गर्मी की हर छुट्टी में मैंने उन नुकीले जूतों को पहनने की भरसक लेकिन नाकाम कोशिश की है । जब जूते पहनकर मैं गिर जाती थी तो नानाजी कहते थे "हमारा साजी तो गिर गया, अब कौन चलेगा हमारे साथ" ? और मैं तुरंत ही उठकर चलने लगती थी । मैं बड़ी होती चली गई और नानाजी बूढ़े होते चले गए, और हमारी किस्से कहानियां कम होती चली गईं । उनका सवाल था कि घर से इतनी दूर पढ़ाई करने गए हो, कभी मिलने आ सकोगे हमसे ? मैंने कहा "आती रहूंगी साजी" और तेरा भाई, वो कहां जायेगा अब ? वो तो मुम्बई ही जायेगा । बम्बई ? नानाजी ने आश्चर्य से देखा और फिर बोले, बम्बई तो बहुत दूर है "हम तो ना पहुंच पाएंगे।...
कुछ उधड़े हुए ख़वाब बुन रही हूं...