कुछ ज़रूरी चीज़ें PhD डिग्री की सभी formalities को पूरा करते करते थक रही थी लेकिन महामारी के चलते , लॉकडाउन हो गया । हर जगह से खबर आ रही है कि मरीजों को अस्पतालों में कुछ ज़रूरी चीज़ें नहीं मिल पा रही हैं । कॉलेज बंद होने की वजह से मुझे प्रो उपाध्याय के घर जाना पड़ा। घर के दरवाज़े पर रगों से सजे गणेश जी और बारात का आधा अधूरा सा चित्र बना हुआ था । कारीगर ब्रश से बराबर रंग भरने में लगा हुआ था । मैं डॉरवेल की तरफ बढ़ ही रही थी लेकिन प्रो उपाध्याय ने मुझे पुकारा " प्रेमलता .. जस्ट वेट .. I am coming" मैंने फीकी मुस्कुरहाट से हां में सर हिलाया । अप्रैल की धूप में मास्क लगाए हुए मुझे देखा और पूछा घर तक आने में कोई प्रोब्लम तो नहीं हुई ? मैंने " ना" में जवाब दिया । इससे पहले मैं कुछ और कहती प्रो उपाध्याय कहने लगी "बेटी की शादी है घर पर .. और कुछ ज़रूरी चीज...
कुछ उधड़े हुए ख़वाब बुन रही हूं...