"मुझे सरपंच जी से मिलना है क्या आप मुझे उनका पता बता सकते हैं ?" उदयपुर से वल्लभ नगर पहुंचाने वाली बस से उतरकर, ना जाने कितने लोगो से मैं यह प्रश्न पूछ चुकी थी, कुछ देर की मशकत के बाद स्वास्थ्य केंद्र के एक कर्मी ने मुझ से कहा "चलिए, मैं आपकी सहायता
करता हूं "। चिलचिलाती धूप में, स्कार्फ से ढके मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई । उन्होंने मुझे सरपंच जी के घर तक छोड़ दिया ।
मैंने सरपंच जी से निवेदन किया मुझे कुछ प्रश्न पूछने हैं किसान भाइयों से, कुछ समय मिल जाता तो..
सरपंच जी ने बैठे बैठे ही मौन सहमति दे दी और बैठने के लिए आग्रह किया । मैं प्लास्टिक की कुर्सी पर चुपचाप बैठ गई ।
सरपंच जी ने अधूरी बात पूरी की ..
रे, सचिव जी कैसी बात कर रहे हैं ? खर्चा दुगुना क्यों कर रहे हैं, अब आप ही सोचा ना, अगर कोई महिला सरपंच बनेगी तो जहां भी जायेगी उसे ड्राइवर की आवश्यकता पड़ेगी, और दावत में अकेले तो जायेगी नहीं, सो पतिदेव को भी साथ जाना पड़ेगा । अब आपको तीन लोगो को खाना खिलाना पड़ेगा, या नहीं? बोलिये ?
सचिव जी खड़े हुए ही बोले सही कह रहे हैं सरपंच जी...लेकिन वो प्रेमी युगल क्या करें ?
करना क्या है ? मंगलसूत्र बांध दीजिए गले में ..
सहसा मुझे वहा पाकर सरपंच जी कहते कहते चुप हो गए।
हां, बता छोरी, क्या काम है ?
मैंने कहा सरपंच जी कुछ सवाल पूछने हैं किसानों से, कृषि पत्रिका के बारे में...
अच्छा ।
अकेली आई है? उदयपुर से!
मैंने कहा "जी" आप ही मेरी मदद कर सकते हैं ।
शादी, सगाई..कुछ नहीं हुआ अभी तक ?
मैं मौन ही खड़ी रही ।
फिर सरपंच जी ने पूछा कि रे छोरी अपणा पूरा नाम बता?
मेरा पूरा नाम सुनते ही
अरे..अरे, राजपूत है, वो तो किसी से नहीं डरते, तभी तो अकेली ही चली आई है इतनी दूर
मैंने सरपंच जी से कहा "जी, सर्वे करने के लिए एक ड्राइवर और पतिदेव का खर्चा, अपनी स्कॉलरशिप से उठा पाना मुश्किल है ज़रा, इसलिए अकेले ही चली आई । " खर्चा तीन गुना हो जाता है ना सरपंच जी "।
फिर एक लंबी चुप्पी सरपंच जी के आंगन में पसर गई ।
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