Skip to main content

Posts

अजी सुनिए !

 अंकल..मुझे आज ही यहां शिफ्ट करना है, मैं ज्यादा इंतज़ार नहीं कर सकती, मैंने दरवाज़े पर खड़े हुए, विनमतापूर्वक कहा । अंकल आंटी ने मुझे हैरानी से देखा, फिर आंटी ने चिंता जताते हुए कहा, "बेटा आप कैसे रहोगे आज, रूम में फर्नीचर भी नहीं है, सफ़ाई भी नहीं हुई है यहां, मुझे काफ़ी बुरा लग रहा है ।  मैंने  मुस्कुराते हुए आंटी से कहा "आप टेंशन मत लीजिए आंटी, मैं सफाई कर लूंगी, मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं होगी।          रात में करीब दस बजे अंकल आंटी आए । आंटी ने पूछा "बेटा ! पीले पर्दे मिले हैं आप को कोई दिक्कत तो नहीं है ?" इस बार भी मेरा जवाब हां ही था। आंटी थोड़ी सी शख्त मिज़ाज  हैं लेकिन अंकल खुश मिज़ाज हैं । पर्दे टांगने कहां हैं, कितनी दूरी पर ड्रिल करना है सब आंटी उन्हें बता बता रही थीं "अजी, जरा ध्यान से करिएगा, कितना वक्त लगा रहे हैं, जल्दी कर दीजिए । इतने में आंटी का फोन बजा, वो कॉल अटेंड करने के लिए कमरे से बाहर चली गईं । अंकल ने सीढ़ी पर खड़े रहते हुए मुड़कर पीछे देखा, ठीक है जी ? आंटी को कमरे में ना पाकर, अंकल बाहर निकल कर बोले "अजी सुनिए, एक बा...

फिर शाम को ढलते देखा

रूठी हुई थी एक अरसे से आज मना ली मैंने भीग गई थी वो उस रोज बारिश में सो आज शाम सूखा ली मैंने पहले बोली मिले नहीं तुम बहुत दिनों से क्या तुम भी रूठ गए थे मैं ख़ामोश, सोचता रहा  तुम्हें क्या पता, कमरे के दरवाज़े से हर रोज़ मैं तो तुम्हें ही झांकता रहा परिंदे  घर को लौट रहे थे चांद भी दिखा  कई रोज़ लेकिन तुम्हारे बिन दिन से सीधे रात हो गई । कुछ आप बीती मैंने, कुछ उसने सुनाई, फिर छज्जे पर बैठे हम दोनों  शाम मुस्कुराई ख़ामोशी से परिंदो को देखा उस रोज़ मैंने फिर शाम को ढलते देखा

कुछ ज़रूरी चीज़ें

          कुछ ज़रूरी चीज़ें  PhD डिग्री की सभी  formalities  को पूरा करते करते थक रही  थी लेकिन महामारी के चलते , लॉकडाउन हो गया । हर जगह से खबर आ रही है कि मरीजों को अस्पतालों में कुछ ज़रूरी चीज़ें नहीं मिल पा रही हैं ।  कॉलेज बंद होने की वजह से मुझे प्रो उपाध्याय के घर जाना पड़ा। घर के दरवाज़े पर रगों से सजे गणेश जी और बारात का आधा अधूरा सा चित्र बना हुआ था । कारीगर ब्रश से बराबर रंग भरने में लगा हुआ था । मैं डॉरवेल की तरफ बढ़  ही  रही थी लेकिन प्रो उपाध्याय ने मुझे पुकारा " प्रेमलता .. जस्ट वेट .. I am coming" मैंने फीकी मुस्कुरहाट से हां में सर हिलाया । अप्रैल की धूप में मास्क लगाए हुए मुझे देखा और पूछा घर तक आने में कोई प्रोब्लम तो नहीं हुई ? मैंने  " ना"   में जवाब दिया । इससे पहले मैं कुछ और कहती प्रो उपाध्याय कहने लगी "बेटी की शादी है घर पर .. और कुछ ज़रूरी चीज...

कितना मुश्किल है पहाड़ होना

  पहाड़ों  का रास्ता और मैं समानांतर रूप से आगे बढ़ रहे हैं । यह रास्ता कई मोड़ लेता है और अपनी दिशा बदल लेता है इस रास्ते को देखकर लगता है यह तो मेरी आत्मकथा है । पहाड़ में जन्मे हर व्यक्ति की कहानी कहता है पहाड़ तुमने पहाड़ों को बोलते हुए तो सुना ही होगा क्या तुमने कभी पहाड़ो को मरते हुए देखा है? नहीं, पहाड़ कभी नहीं मरते, ना ही कभी बूढ़े होते हैं कहानियां भी कभी नहीं मरती वो भी अमर हो जाती हैं पहाड़ों के बीच मेरे और तुम्हारे बीच क्या तुमने कभी सोचा मरने के बाद आखि़र कहां जाती होगी रूह हां.. कई बार सोचा और जबाब मिला इस जमीं और आसमां के दरमियान जो पहाड़ हैं बस, वही बस जाती है पहाड़ों को छोड़ कोई कभी जा सकता है क्या ? पहाड़ होना हल्की धुंध में लिपटे हुए पहाड़ सफ़ेद बर्फ से ढके हुए पहाड़ गिरती हुई बारिश में भीगते पहाड़ हल्की धूप में सोने से चमकते पहाड़ हमेशा ही ख़ूबसूरत होते हैं पहाड़ काश! पहाड़ भी बोल पाते कितना मुश्किल होता है पहाड़ बने रहना । पहाड़ और नदी तुम तो पर्वत हो स्थिर, विशाल शिखर से ऊंचे और तुम? तुम्हारे विपरीत, गहराई की ओर भावनाओं से भरी हुई, निरन्तर बहने वाली, नदी...

कविता क्या है ?

आसान सवालो के जवाब अक्सर मुश्किल होते हैं कविता क्या है कहाँ है क्यों है? ये सब है पूछते पर ये पूछता नही कोई कविता कहाँ नहीं है ? कविता क्या नहीं है? कविता मेरे अंदर भी है कविता मेरे बाहर भी है? पर सवाल यही है ? जगबीती लिखुं या आपबीती लिखुं एक बात तुम्हारी भी सही है एक बात मेरी भी सही है । कविता की कोई परिभाषा ही नही है । जो कागज़ पर सहेजा है मैंने वो कविता है जो मन पर उकेरा है मैन वो कविता है कविता मैं क्या लिखूं ये कविता मुझको दिन रात लिखती है । ये पल बीते साल लिखूं या सदियों बीती बात लिखूं । सरसों से भरा खेत लिखूं या हथेली से फिसलती रेत लिखूं आँखों से बहता प्यार लिखूं या समंदर के उस पार लिखू कविता मैं क्या लिखूं ये कविता मुझको दिन रात लिखती है । तेरी मेरी बात लिखूं या जीवन भर का साथ लिखूं फूलों सी महकती मुस्कान लिखूं या ये धरती आसमान लिखूं कविता मैं क्या लिखूं  ये कविता मुझको दिन रात लिखती है । जीवन का सार लिखू या प्रतिदिन का व्यवहार लिखूं । कोई बिछड़ा मीत लिखूं या कण में बसा संगीत लिखूं पर सवाल यही है ? जगबीती लिखुं या आपबीती लिखुं एक बात तुम्हारी भी सही है एक बात मेरी भी सही है ...

नमक और चीनी

  शाम की चाय पीते हुए मन में एक ख़्याल आया की ज़िंदगी को खट्टा मीठा बनाने के लिए चीनी और नमक, दोनो ही कितने जरूरी हैं । चाय की हर एक चुस्की मुझे यह यकीन दिलाती थी हां मीठी तो है ज़िंदगी.. उम्र के साथ थोड़ा थोड़ा अनुभव  घुलना पड़ता है । अच्छी चाय बनाने के लिए  चाय की पत्ती और दूध को पकाना जरूरी होता है ना ? और कभी अदरक के साथ पका लिया तो रंग के साथ के साथ खुशबू भी अच्छी तरह चढ़ जाती है । चाय के साथ एक मुरमुरे वाली  नमकीन भी थी जो मैंने खुद बनाई थी । नमकीन के साथ होने के दो मुख्य कारण थे।  पहला तो यह, कि  मुझे ज्यादा मीठा पसंद नहीं, दूसरा कारण शायद यह था कि जिंदगी में किसी का साथ मिल जाए ना तो जिंदगी आसान हो जाती है ।  एक नमक और एक चीनी, याद है बचपन में जब मम्मी खाने में ज्यादा नमक और मसाले पसंद करती थी।  खाने के बाद पापा एक रसगुल्ला खिला कर सबकुछ ठीक कर देते थे। "ले अब मिर्च नहीं लगेगी" । समय बीत गया है मम्मी ने मसाले कम कर दिए हैं लेकिन जब भी जिंदगी में नमक कम लगता है तो चुटकी भर नमक मिलाकर सब ठीक कर देती हैं । रसगुल्ला अब मम्मी नहीं खा पाती, डायब...