आसान सवालो के जवाब अक्सर मुश्किल होते हैं कविता क्या है कहाँ है क्यों है? ये सब है पूछते पर ये पूछता नही कोई कविता कहाँ नहीं है ? कविता क्या नहीं है? कविता मेरे अंदर भी है कविता मेरे बाहर भी है? पर सवाल यही है ? जगबीती लिखुं या आपबीती लिखुं एक बात तुम्हारी भी सही है एक बात मेरी भी सही है । कविता की कोई परिभाषा ही नही है । जो कागज़ पर सहेजा है मैंने वो कविता है जो मन पर उकेरा है मैन वो कविता है कविता मैं क्या लिखूं ये कविता मुझको दिन रात लिखती है । ये पल बीते साल लिखूं या सदियों बीती बात लिखूं । सरसों से भरा खेत लिखूं या हथेली से फिसलती रेत लिखूं आँखों से बहता प्यार लिखूं या समंदर के उस पार लिखू कविता मैं क्या लिखूं ये कविता मुझको दिन रात लिखती है । तेरी मेरी बात लिखूं या जीवन भर का साथ लिखूं फूलों सी महकती मुस्कान लिखूं या ये धरती आसमान लिखूं कविता मैं क्या लिखूं ये कविता मुझको दिन रात लिखती है । जीवन का सार लिखू या प्रतिदिन का व्यवहार लिखूं । कोई बिछड़ा मीत लिखूं या कण में बसा संगीत लिखूं पर सवाल यही है ? जगबीती लिखुं या आपबीती लिखुं एक बात तुम्हारी भी सही है एक बात मेरी भी सही है ...
कुछ उधड़े हुए ख़वाब बुन रही हूं...